– विनाश पर सृजन की विजय के 1000 वर्ष और पुनरुत्थान के 75 गौरवशाली वर्ष

राजकुमार दक्ष (वरिष्ठ पत्रकार)
सोमनाथ। 9 से 12 जनवरी 2026 में भारत ने अपनी आध्यात्मिक चेतना के सबसे स्वर्णिम अध्यायों में से एक का उत्सव मनाया। गुजरात के प्रभास पाटन स्थित प्रथम ज्योतिर्लिंग भगवान सोमनाथ के मंदिर पर हुए ऐतिहासिक हमले के 1000 वर्ष पूरे होने और स्वतंत्र भारत में इसके पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूर्ण होने पर 9 से 12 जनवरी तक ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ का भव्य आयोजन किया गया।
यह आयोजन केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत के अडिग स्वाभिमान की पुनर्स्थापना का प्रतीक बना। इस दाैरान पूरे मंदिर परिसर और नगर को भव्य एवं दिव्य रूप देने के लिए विभिन्न प्रकार के फूलों व रंगीन लाइटों से सजाया गया। भव्य मंदिर के पीछे बहता अरब सागर पल पल हिलोरे मारकर मानों विश्व का कल्याण करने वाले महादेव के चरण पखारने को आतुर नजर आया। इस मंदिर की रक्षा एवं पुर्नाेंद्धार में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले महानुभावों की आत्मा अगर शून्य में कहीं होगी तो यहां के दिव्य नजारों को देखकर हर्षित हो रही होगी कि आज फिर से उनको अपने कृत्यों पर गर्व हो रहा होगा।
शौर्य यात्रा और सांस्कृतिक कार्यक्रम
9 से 12 जनवरी तक चार दिवसीय इस उत्सव में शौर्य, भक्ति और तकनीक का अद्भुत संगम देखने को मिला : –
शौर्य यात्रा : हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने उस पथ पर पदयात्रा की, जहां कभी अतातायियों का सामना पूर्वजों ने अपने प्राण देकर किया था। यात्रा का उद्देश्य नई पीढ़ी को पूर्वजों के बलिदान से अवगत कराना था।
महामृत्युंजय अनुष्ठान : राष्ट्र के कल्याण और एकता के लिए विशेष यज्ञों का आयोजन किया गया।
आधुनिक प्रस्तुति : मंदिर के इतिहास को दर्शाने वाला अत्याधुनिक ‘थ्री-डी प्रोजेक्शन मैपिंग शो’ आयोजित किया गया, जिसने सोमनाथ के विध्वंस से लेकर सरदार पटेल के संकल्प तक की यात्रा को जीवंत कर दिया।
प्रधानमंत्री के संबोधन के मुख्य अंश
प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर मौजूद लाखों लोगों को संबोधित करते हुए सोमनाथ को ‘भारत के आत्मविश्वास का केंद्र’ बताया। कहा कि इतिहास गवाह है कि सत्ता के मद में चूर आक्रांताओं ने सोचा था कि वे मंदिर की ईंटें हिलाकर भारत की आस्था को मिटा देंगे, लेकिन आज 1000 साल बाद भी सोमनाथ अपनी दिव्यता के साथ खड़ा है और आक्रांता इतिहास के पन्नों में धूल बन चुके हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि सरदार पटेल न होते तो सोमनाथ का यह वैभव आज हमारे पास न होता। उन्होंने इसे “गुलामी की मानसिकता से मुक्ति” का पहला बड़ा कदम बताया। आज का भारत अपनी विरासत पर गर्व भी करता है और आधुनिक विकास के पथ पर भी अग्रसर है। सोमनाथ का विकास देश के पर्यटन और अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा दे रहा है।
9 से 12 जनवरी तक चला यह ‘स्वाभिमान पर्व’ भारत के गौरव की पुनर्वापसी का उत्सव था। 1000 साल के लंबे अंतराल और 75 साल के नवनिर्माण ने सिद्ध कर दिया कि सत्य और शिव शाश्वत हैं। सोमनाथ की यह शौर्य गाथा आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रभक्ति और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देती रहेगी।
सरदार पटेल का योगदान और के.एम. मुंशी की निष्ठा
1947 में जूनागढ़ की मुक्ति के बाद सरदार पटेल ने मंदिर के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया। यह कार्य जन सहयोग से पूर्ण हुआ। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के.एम. मुंशी) ने नेहरू जी के विरोध के बावजूद इस सांस्कृतिक कार्य को अपनी अटूट निष्ठा से पूर्ण कराया, जिसे प्रधानमंत्री ने भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता का आधार बताया।
वास्तुकला की भव्यता (चालुक्य शैली)
वर्तमान मंदिर ‘प्रभाशंकर सोमपुरा’ द्वारा अभिकल्पित ‘कैलाश महामेरु प्रासाद’ शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
बाण स्तंभ : यह मंदिर के प्रांगण में स्थित एक अद्भुत पुरातात्विक साक्ष्य है। इस पर स्थित दिशा सूचक यह बताता है कि सोमनाथ और दक्षिण ध्रुव के बीच जलमार्ग में कोई बाधा या भूमि नहीं है। यह प्राचीन भारतीय भूगोल शास्त्र की सटीकता का प्रमाण है।
