- शांत शहर की पहचान पर दाग
- बाहरी अपराधियों की बढ़ती सक्रियता
- पुलिस की कार्यप्रणाली कटघरे में
देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून कभी अपनी शांत फिजा और सुरक्षित माहौल के लिए जाना जाता था। अब लगातार बढ़ते अपराधों से दहल उठा है। दिनदहाड़े गोलीकांड और हत्याओं की घटनाओं ने आम लोगों के मन में डर बैठा दिया है। हालिया घटनाओं में खुलेआम गोली मारकर हत्या जैसे मामले सामने आए हैं। जिससे शहर की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
अपराध करने वाले अधिकतर आरोपी बाहरी राज्यों से जुड़े हुए हैं। जो यहां आकर वारदातों को अंजाम देकर आसानी से फरार हो जाते हैं। हाल ही में सुबह मॉर्निंग वॉक के दौरान एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी को गोली मार दी गई। जो इस बात का संकेत है कि अब अपराधियों में पुलिस का कोई डर नहीं बचा है।
शहर के व्यस्त इलाकों में भी अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि वे खुलेआम वारदात कर रहे हैं। इससे न केवल आमजन में दहशत है बल्कि देहरादून की छवि पर भी असर पड़ रहा है।
अब घर से निकलना भी सुरक्षित नहीं
देहरादून में लगातार बढ़ रही आपराधिक घटनाओं ने आम नागरिकों के मन में गहरी दहशत पैदा कर दी है। जिस शहर को कभी शांत और सुरक्षित माना जाता था, वहीं अब दिनदहाड़े गोली चलने और हत्या जैसी घटनाएं सामान्य होती जा रही हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि सुबह की सैर, बाजार जाना या देर शाम घर लौटना, हर गतिविधि अब जोखिम भरी लगने लगी है। खासकर महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
लोगों का आरोप है कि अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि उन्हें पुलिस या कानून का कोई डर नहीं रह गया है।
पुलिस और सिस्टम में सवाल
देहरादून में बढ़ते अपराधों के बीच पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। लगातार हो रही घटनाओं के बावजूद अपराधियों पर प्रभावी कार्रवाई न होना चिंता का विषय बन गया है। शहर में निगरानी व्यवस्था और खुफिया तंत्र कमजोर पड़ता नजर आ रहा है, जिसका फायदा अपराधी उठा रहे हैं।
बाहरी राज्यों से आकर अपराध करने वाले गिरोहों पर नियंत्रण न होना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।
शांत शहर बन रहा अपराध की राजधानी
देहरादून की पहचान हमेशा एक शांत और सुकून भरे शहर की रही है। मौजूदा हालात उस छवि को धूमिल कर रहे हैं। लगातार बढ़ते अपराध प्रशासन के लिए साफ संकेत हैं कि अब केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि जमीन पर सख्त और प्रभावी कार्रवाई की जरूरत है।यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो देहरादून का माहौल पूरी तरह बदल सकता है और इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा।
बड़े मामले
13 फरवरी 2026 को राजपुर रोड शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में कुख्यात गैंगस्टर विक्रम शर्मा की गोली मारकर हत्या। F जांच कर रही है।
फरवरी महीने में शिवाजी नगर, ऋषिकेश में एक व्यक्ति ने अपनी प्रेमिका एम्स कर्मचारी को गोली मारकर हत्यावकर दी थी। दोनों के बीच शादी और पैसों को लेकर विवाद चल रहा था।
9 दिसंबर 2025 सेलाकुई में पूर्वोत्तर के छात्र एंजेल चकमा पर कुछ लोगों ने नस्लीय टिप्पणी की। विवाद बढ़ा और चाकू से हमला कर हत्या कर दी गई।
26 फरवरी 2026 को राजपुर क्षेत्र में पुलिस ने चेकिंग के दौरान गैंग के 2 सदस्यों को पिस्टल और कारतूस के साथ पकड़ा था। शक था कि ये लोग बड़ी वारदात की तैयारी में थे।
गोलीकांड और अपराधों के पीछे अवैध असलहों का जाल
शांत माने जाने वाले देहरादून में अब अपराधों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। मामूली विवाद भी अब गोलीकांड और हत्या तक पहुंच रहे हैं, जिसकी बड़ी वजह शहर में अवैध हथियारों की बढ़ती उपलब्धता एक कारण है। पुलिस और STF की जांच में सामने आया है कि बाहरी राज्यों से हथियारों की सप्लाई हो रही है।
हाल में कई मामलों में अवैध पिस्टल और कारतूस के साथ आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है।
प्रशासन की सख्ती भी सवालों में
जिला प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए 800 से ज्यादा शस्त्र लाइसेंस रद्द किए हैं। बावजूद इसके, जमीन पर अवैध हथियारों का चलन कम नहीं हो रहा है।इसका मतलब साफ है कि लाइसेंसी नहीं, बल्कि गैरकानूनी हथियार सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं।
कॉलेजों में बढ़ते झगड़े और हथियारबंद छात्र
देहरादून के विभिन्न कॉलेजों में इन दिनों बाहरी राज्यों से आए छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसके साथ ही झगड़े और विवाद की घटनाएं भी लगातार सामने आ रही हैं। कई मामलों में छात्रों के पास अवैध पिस्टल और अन्य हथियार होने की बात भी सामने आई है। जिसने माहौल को और चिंताजनक बना दिया है।
पुलिस द्वारा ऐसे छात्रों की पहचान के लिए लगातार अभियान चलाया जा रहा है। संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखते हुए चेकिंग और वेरिफिकेशन भी किए जा रहे हैं। इसके बावजूद झगड़ों और आपराधिक प्रवृत्तियों पर पूरी तरह रोक नहीं लग पा रही है।
स्थानीय लोगों और अभिभावकों में इस स्थिति को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर सख्ती और कार्रवाई के बावजूद ऐसे मामलों में कमी क्यों नहीं आ रही है।
