Dehradun : गुरु पूर्णिमा कृतज्ञता और समर्पण का महापर्व है। इस दिन गुरु दक्षिणा के रूप में गुरु को कुछ ना कुछ समर्पण करना चाहिए । इस दिन हर शिष्य के मन में विचार आता है कि मै गुरु के पास जाकर प्रत्यक्ष दर्शन करु। संभव हो, तो गुरु पूर्णिमा पर गुरु के सम्मुख उपस्थित होना सर्वोपरि माना गया है। गुरु के सानिध्य में एक सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र होता है। उनके चरणों में बैठने से मन शांत होता है और आध्यात्मिक तरंगें सीधे शिष्य को प्रभावित करती हैं। जब एक शिष्य भौतिक रूप से गुरु के सामने झुकता है, तो उसके भीतर का अहंकार समाप्त होता है। प्रत्यक्ष मिलने पर शिष्य अपनी शंकाओं, जीवन की समस्याओं और आध्यात्मिक प्रगति पर गुरु से सीधा संवाद कर सकता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण सनातन परंपरा और अध्यात्म शास्त्र के अनुसार, गुरु केवल एक हाड़-मांस का शरीर नहीं, बल्कि एक ‘तत्व’ (चेतना) हैं।


यदि कोई शिष्य गंभीर परिस्थितियों, बीमारी या अत्यधिक दूरी के कारण गुरु के पास नहीं जा पाता, तो उसका पर्व निष्फल नहीं होता। शास्त्रों में ‘मानस पूजा’ को श्रेष्ठ माना गया है। यदि आप गुरु पूर्णिमा के दिन शांत बैठकर गुरु का ध्यान करते हैं और उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं, तो वह पूजा भी गुरु तक स्वतः पहुँच जाती है। अध्यात्म में ‘भाव’ मुख्य है, ‘भौतिक उपस्थिति’ नहीं। भाव सच्चा है तो गुरु हृदय में ही वास करते हैं। आज के डिजिटल युग में दूरियां सिमट गई हैं। यदि प्रत्यक्ष जाना संभव न हो, तो संचार माध्यमों को अपनाया जा सकता है । तकनीक के माध्यम से गुरु के लाइव दर्शन और उपदेश सुनना भी प्रत्यक्ष उपस्थिति जैसा ही फल देता है। परिस्थितियां अनुकूल हों, तो गुरु पूर्णिमा पर गुरु के पास प्रत्यक्ष जाना अत्यंत फलदायी और जरूरी है। यह शिष्य के भीतर अनुशासन और समर्पण जगाता है। परंतु, यदि किसी अनिवार्य कारण से आप नहीं जा पा रहे हैं, तो अपने स्थान पर ही पवित्र मन से गुरु का ध्यान करें, क्योंकि गुरु तत्व सर्वव्यापी है और वह शिष्य के सच्चे भाव को कहीं से भी ग्रहण कर सकता है तथा गुरु दक्षिणा और गुरु वस्त्र अन्य माध्यम से भी आप पहुंचा सकते हैं।
