देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से कथाकार मुकेश नौटियाल की पुस्तक ‘भौं कुछ’ का आज केन्द्र के सभागार में विधिवत लोकार्पण हुआ। लोकार्पण समारोह में साहित्य, संस्कृति और कला क्षेत्र के अनेक विद्वान शामिल हुए।

अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ साहित्यकार जितेन ठाकुर ने कहा कि मुकेश नौटियाल का लेखन रूस के महान लेखक रसूल हमजातोव की गद्यशैली की याद दिलाता है। उन्होंने कहा कि लेखक ने अपनी स्मृतियों की इस श्रृंखला की शुरुआत अपनी दादी द्वारा गढ़े गए एक मौलिक बिम्ब ‘स्मृतिमाई’ की चर्चा से की है और यहीं से पाठक की जिज्ञासा किताब को आगे पढ़ने की होने लगती है। पुस्तक के सभी 14 अध्याय नई-नई घटनाओं और अनूठे चरित्रों के ज़रिए हिमालयी लोक के समूचे समाजशास्त्र को सामने लाते हैं। यह किताब उपेक्षा, अपमान और संत्रासों की अंधेरी दुनिया में उम्मीद की एक लौ के सहारे जीत के मुक़ाम को छूने का एक बेहतरीन साहसिक आख्यान है।
विशिष्ट अतिथि दूरदर्शन और आकाशवाणी के कार्यक्रम प्रमुख अनिल भारती ने कहा कि ‘भौं कुछ’ शीर्षक की इस किताब का लोकार्पण समारोह दरअसल हिमालयी लोक की संस्कृति, सभ्यता और पहचान को स्थापित करने के लिए आयोजित एक वृहद उत्सव है। उन्होंने कहा कि अपनी परंपराओं, मान्यताओं और ऐतिहासिक आख्यानों का यह दस्तावेज़ पाठकों को पर्वत-प्रांतर के वास्तविक चरित्र से बख़ूबी परिचित कराता है। लेखक ने अपने बचपन से लेकर वर्तमान तक की लगभग पाँच दशकों के अंतराल की यात्रा को इस किताब में बेहद प्रभावी शैली के साथ प्रस्तुत किया है। इसमें पाठक को जहां पहाड़ों के सौंदर्य का मधुरतम रूप देखने को मिलता है, वहीं यहां के संघर्षमय जीवन की स्पष्ट झलक भी नज़र आती है। यही एक लेखक का दायित्व भी है कि वह अपने समय और समाज को साहित्य में बिना किसी पूर्वाग्रह के पूरी प्रामाणिकता से दर्ज करे।
साहित्यकार अमित श्रीवास्तव ने अपने वक्तव्य में इस समय को साहित्य के लिए खास उर्वर बताते हुए कहा कि 90 के दशक के बाद हम लगातार एक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं, जिसमें आने वाले समय का नक्शा अभी पूरी तरह उभरा नहीं है और बीता हुआ समय अभी बिल्कुल ताज़ा ज़ख़्म-सा टीस रहा है। ‘भौं कुछ’ इस टीस की आवाज़ है। यह उस नक्शे को टटोलने की कोशिश भी है, जिसके धुंधले अक्स धीरे-धीरे अनफोल्ड हो रहे हैं। इसकी आवाज़ में एक मिठास है और रेखाओं में उजास। ‘भौं कुछ’ की पूरी तरकीब मानव की जिजीविषा की रचनात्मक अभिव्यक्ति है।
शिक्षाविद डॉ. सविता मोहन ने कहा कि मुकेश नौटियाल ने जिस यथार्थ को भोगा है, उसी पर लिखा भी है। यही कारण है कि उनकी कहानियों के दृश्य बेहद जीवंत और भाषा बहुत प्रभावशाली होती है। उनके पाठकों को लगता होगा जैसे वे अपने ही अतीत को किसी स्क्रीन पर देख रहे हैं। ‘भौं कुछ’ भी हमारे अतीत का दस्तावेज़ है। अच्छा होगा अगर इस किताब को स्कूलों तक हमारी नई पीढ़ी के पास पहुंचाया जाए, ताकि उन्हें पता चल सके कि हिमालय के जिस अंचल में वे रह रहे हैं, उसका अतीत कितना विविधतापूर्ण, कितना संघर्षमय और कितना अद्भुत रहा है।
किताब की रचना प्रक्रिया पर बोलते हुए लेखक मुकेश नौटियाल ने कहा कि इस किताब के ज़रिए उन्होंने अपने पर्वतीय समाज के अचिन्हे चेहरों को फिर से याद करने की कोशिश की है। ‘भौं कुछ’ के कंटेंट को किसी एक विधा में नहीं बांधा जा सकता। यहां स्मृतियां हैं, आख्यान हैं, कुछ फ़िक्शन है, थोड़ी कविता है। ऐसे में यह कई विधाओं का मिश्रण है, एक तरह से भौं कुछ। पहाड़ी भाषा में भौं कुछ का मतलब होता है—कुछ भी। उन्होंने आशा व्यक्त की कि कथेतर साहित्य का यह नया शिल्प पाठकों को पसंद आएगा।
कार्यक्रम का संचालन सुप्रसिद्ध साहित्यकार बीना बेंजवाल ने किया। काव्यांश प्रकाशन के प्रबोध उनियाल ने धन्यवाद ज्ञापन देते हुए कहा कि लेखक का अपना पाठक-वर्ग ही उससे नई-नई किताबें लिखवाता है और मुकेश नौटियाल इसके बेहतरीन उदाहरण हैं। उनकी कहानियां और यात्रा-वृत्तांत चर्चित रहे हैं। अब वह गद्य शैली में कुछ नए प्रयोग कर रहे हैं, तो आशा की जानी चाहिए कि इनको भी पसंद किया जाएगा।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र साहित्य, कला, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान से जुड़े कार्यक्रमों के माध्यम से संवाद, विचार-विमर्श, पठन-पाठन तथा शोध को प्रोत्साहित करता है और समाज में ज्ञान 1 एवं रचनात्मकता के प्रसार के लिए कार्यरत है।
कार्यक्रम में दून पुस्तकालय के कार्यक्रम प्रमुख चंद्रशेखर तिवारी, पुस्तकालयाध्यक्ष डी. के. पाण्डे, डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर सिंह बिष्ट, जे. पी. ममगाईं, रमाकांत बेंजवाल, डॉ. राजेश पाल, रजनीकांत सेमवाल, शशि भूषण बडोनी, शूरवीर रावत, जयप्रकाश पंवार, ज्योत्सना जोशी, डॉ. राम विनय सिंह, निक्की पुष्कर सहित अनेक साहित्यकार, लेखक, कवि, संस्कृतिकर्मी और प्रबुद्ध जन उपस्थित थे।
