आचार्य श्री 108 सौरभ सागर जी महाराज का 56वाँ अवतरण दिवस ‘परोपकार दिवस’ के रूप में मनाया गया
देहरादून। सकल दिगंबर जैन समाज एवं श्री विद्या समय पूर्ण वर्षायोग समिति के तत्वावधान में परम पूज्य वात्सल्यमयी आर्यिका रत्न श्री 105 पूर्णमति माताजी के मंगल सानिध्य में संस्कार प्रणेता, ज्ञानयोगी परम पूज्य आचार्य श्री 108 सौरभ सागर जी महाराज का 56वाँ अवतरण दिवस 22 अक्टूबर 2026 को परोपकार दिवस के रूप में श्रद्धा एवं सेवा भाव के साथ मनाया गया।
इस पावन अवसर पर जैन भवन, गांधी रोड के मुख्य द्वार पर सौरभ सागर सेवा समिति द्वारा कढ़ी-चावल एवं हलवे का भंडारा आयोजित कर श्रद्धालुओं एवं जरूरतमंदों को प्रसाद वितरित किया गया। वहीं, जैन मिलन राजुल द्वारा श्रीजी के चरणों में अर्घ्य समर्पित कर धर्मलाभ प्राप्त किया गया।
महाराज श्री ने देहरादून से मेरठ पहुंचे अपने सभी भक्तों को मेरठ में चल रहे चतुर्मास से ही अपने सभी श्रद्धालुओं को अपने अवतरण दिवस पर बहुत-बहुत आशीर्वाद दिया।
धर्मसभा में गुरुमाँ ने दिया आत्मकल्याण का संदेश
परम पूज्य पूर्णमति माताजी के मंगल सानिध्य में आयोजित धर्मसभा का शुभारंभ नमोकार मंत्र के शुद्ध उच्चारण के साथ हुआ। अपने प्रवचन में गुरुमाँ ने आत्मा और शरीर के भेद को समझाते हुए कहा कि केवल पूजा-पाठ, अभिषेक, माला फेरने और अर्घ्य चढ़ाने जैसी बाहरी धार्मिक क्रियाओं से ही आत्मकल्याण नहीं होता, बल्कि उन क्रियाओं के दौरान हमारे भाव, विचार और उपयोग की शुद्धता अधिक महत्वपूर्ण है।
गुरुमाँ ने कहा कि हम पूजा-पाठ और जाप तो करते हैं, लेकिन हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि क्या हमारा मन वास्तव में धर्म में लगा है? धार्मिक क्रियाओं के समय यदि मन संसार की बातों, इच्छाओं और मोह-माया में उलझा रहता है, तो हमें अपने भावों को समझने और सुधारने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि पूजन करते समय हमारे भाव ऐसे होने चाहिए कि हम प्रभु के समान आत्मानुभव की दिशा में आगे बढ़ सकें। केवल शरीर से धार्मिक क्रियाएँ कर लेने से कोई धर्मात्मा नहीं बन जाता। सच्चे धर्म की शुरुआत तब होती है, जब व्यक्ति अपने भीतर झाँककर यह समझने का प्रयास करता है कि मैं कौन हूँ और मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है।
गुरुमाँ ने कहा कि मनुष्य जीवनभर शरीर की सुरक्षा, परिवार, धन-संपत्ति और सांसारिक सुख-सुविधाओं को जुटाने में लगा रहता है, लेकिन अपनी आत्मा के कल्याण के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं करता। शरीर, परिवार और बाहरी संयोग स्थायी नहीं हैं। जीव और शरीर का स्वरूप अलग-अलग है तथा संसार के सभी संयोग परिवर्तनशील हैं।
उन्होंने आगे कहा कि जीव अनादि काल से संसार में अकेला भ्रमण कर रहा है। न कोई उसके साथ आया है और न कोई उसके साथ जाएगा। इसलिए मनुष्य को अपने परिणामों की शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए। जब जीव देह के प्रति मोह और राग को छोड़कर आत्मस्वरूप की ओर उन्मुख होता है, तब उसमें सम्यक् दृष्टि और सच्चे ज्ञान का विकास होता है।
गुरुमाँ ने श्रद्धालुओं को निरंतर तत्त्वज्ञान एवं भेदज्ञान का अभ्यास करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि शरीर और आत्मा के अंतर को गहराई से समझना, अपने भावों को शुद्ध करना तथा आत्मा के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करना ही सच्चे धर्म की शुरुआत है।
आगामी धार्मिक एवं संस्कार कार्यक्रमों की घोषणा
इस अवसर पर जैन समाज की मीडिया कोऑर्डिनेटर मधु जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि आगामी 25 अक्टूबर को भक्ति संध्या एवं धार्मिक ऑनलाइन हाउजी ‘विद्या गुरु वंदना सीजन-2’ का आयोजन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त 1 नवंबर को बालक-बालिका संस्कार कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जिसका उद्देश्य बच्चों में धार्मिक संस्कार, नैतिक मूल्यों एवं भारतीय संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
कार्यक्रम में सकल दिगंबर जैन समाज, श्री विद्या समय पूर्ण वर्षायोग समिति के सदस्य एवं पदाधिकारी, जैन भवन की कार्यकारिणी के सदस्य, विभिन्न जैन संस्थाओं के प्रतिनिधि तथा अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

