‘माँ क्या गई कि जैसे कोई छत चली गई’

सुख़न-फ़हम की ओर से आयोजित मुशायरे में शायरों ने अपनी ग़ज़लों से बांधा समां
दर्द गढ़वाली के ग़ज़ल संग्रह ‘दर्द गढ़वाली की सौ ग़ज़लें’ का भी हुआ लोकार्पण
देहरादून: वरिष्ठ पत्रकार एवं शायर दर्द गढ़वाली के पांचवें ग़ज़ल संग्रह ‘दर्द गढ़वाली की सौ ग़ज़लें’ का शनिवार को यहां उत्तरांचल प्रेस क्लब के सभागार में लोकार्पण किया गया। इस मौके पर अखिल भारतीय कवि सम्मेलन एवं मुशायरे का आयोजन भी किया गया, जिसमें तमाम शायरों ने जहां समाज की विसंगतियों पर तंज कसे, वहीं प्यार-मुहब्बतों की ग़ज़लें सुनाकर समां बांध दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों कांग्रेस नेता वैभव वालिया, फिल्म अभिनेता-निर्माता शुभांक गुप्ता, फिल्म निर्माता सुभाष चावला और युवा कांग्रेस रुड़की के नगर अध्यक्ष उवैस अंसारी ने दीप प्रज्वलित कर की। वरिष्ठ शायर नवीन नीर के दो शेर ‘मुझको बहरा ही करके छोड़ेंगे, उफ़ ये ख़ामोश रहने वाले लोग’ और ‘ उसकी हमदर्दी का मैं तो कायल हूं, रोने लगता हूं तो रोने देता है’ से खूब वाहवाही लूटी। दर्द गढ़वाली के शेर ‘माँ की दुआ थी घर को संभाले हुए मगर, माँ क्या गई कि जैसे कोई छत चली गई’ को भी खूब पसंद किया गया। उस्ताद शायर ज़िक्रिया गौहर के शेर ‘शाहिद तमाम डूब गए हैं गुनाह में, ये कौन आ गया है मेरी खानकाह में’ को भी खूब दाद मिली।
वरिष्ठ पत्रकार एवं शायर परमवीर कौशिक के शेर ‘वक्त का तकाज़ा है खुद को ही बदल लीजे, अब वफा मोहब्बत में लाज़मी नहीं होती’ को भी खूब सराहा गया। वरिष्ठ शायर अब्दुल कय्यूम बिस्मिल ने अपने शेर ‘मैं मरकर हिंद की मिट्टी में इस तरह से सोता हूं, कि जैसे मां कोई बच्चे को आंचल में सुलाती है’ से खासी तालियां बटोरी। युवा शायर राजकुमार ‘राज’ के शेर ‘मैंने ये कब कहा है कि झुक कर सलाम कर, लेकिन तू मेरी उम्र का तो एहतिराम कर’ को भी खासा सराहा गया। युवा शायर अमन रतूड़ी के इस शेर ‘हम रस्म-ए-काइनात के उस मरहले पे हैं, जो साँप आस्तीन में थे अब गले पे हैं’ को भी लोगों ने सराहा।
वरिष्ठ शायर जिगर देवबंदी ने संचालन करते हुए अपने इस शेर ‘ हैं फूल भी हमारे खुशबू भी हमारी है, हिंदी भी हमारी है उर्दू भी हमारी है’ से खूब वाहवाही लूटी। युवा शायर राशिद कमाल के शेर ‘सबको अपने फर्ज पे कुर्बान होना चाहिए, आदमी कुछ हो न हो इंसान होना चाहिए’ को भी खूब पसंद किया गया। वरिष्ठ शायर शादाब मशहदी के दो शेर ‘रिश्ता-ए-ग़ैर ही वो मुझसे निभाए, आए, दिल पे इक ज़ख़्म नया फिर से बनाए, आए, मैं तो फ़रियादी हूँ सावन में पपाहे की तरह, अब्र बनकर जो मेरी प्यास बुझाए, आए’ भी पसंद किए गए‌। जुबेर राना को अपने शेर ‘ इसके आइनो कवनिन की इज़्ज़त की है, हमने इस मुल्क की मिट्टी से मोहब्बत की है’ पर खूब सराहना मिली।
शिवचरण शर्मा ‘मुज़्तर’ के इस शेर ‘सांस भी लेने पड़ेंगे,पूछ कर सरकार से, धड़कने भी लिंक होने वाली हैं आधार से’ को भी खूब पसंद किया गया।
कुमार विजय द्रोणी के दो शेर ‘ज़माने से ये दिल भी डरने लगा है, गुलाबी सा मौसम गुजरने लगा है, दिखावे की दुनिया, दिखावे के लोग, दिखावे से दिल अब दरकने लगा है’ को भी खूब पसंद किया गया। युवा शायरा अनहद के शेर ‘तमाशे का नहीं है शौक़ वर्ना, पता वो बात मुझको चल गई है’ को भी खासी दाद मिली। युवा शायरा अफ़्सा अज़मत ने यह शेर ‘ख़ुद हुनर रास्ता बना लेगा, आप मत दीजे रास्ता हम को’ सुनाकर खूब तालियां बटोरी।
इससे पहले, दर्द गढ़वाली के ग़ज़ल संग्रह का लोकार्पण करते हुए वक्ताओं ने कहा कि दर्द गढ़वाली की ग़ज़लें और शेर समसामयिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। सामाजिक, राजनीतिक व व्यक्तिगत संवेदनाओं को उकेरती हुई उनकी रचनाएं लोगों को गहरे तक प्रभावित करती हैं। साफगोई और सीधे-सीधे व्यंग्य इन गज़लों की खासियत है। इस मौके पर जियाउद्दीन शेख, तय्यबा कौसर आरज़ू, तापस चक्रवर्ती, सोमेश्वर पांडे, डॉली डबराल, भुवन प्रकाश बडोनी, चंदन सिंह नेगी, सतीश बंसल, माहेश्वरी कनेरी आदि मौजूद थे।

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